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मासूमों के साथ जन्मदाताओं की परीक्षा

बच्चों के साथ माता पिता की भी एक तरह परीक्षा होती हैं क्योंकि बच्चों को अच्छे स्कूल में एडमिशन नहीं मिलेगा।अगर माता पिता काम पढ़े लिखे हो उनकी जॉब छोटे लेवल की हो या माता कम पढ़ी लिखी के साथ अगर ग्रहणी हो  तो बच्चों एडमिशन लेना एक जंग की तरह होता हैं।वही वो माता पिता अगर अच्छे औधे पर उनका एडमिशन होने कोई  परेशानी नहीं आती क्योंकि उन्हें अच्छी फीस या उनका वाहवाही होती हैं।

कई स्कूल फॉर्म में पेरेंट्स की एजुकेशन पूछते हैं, सिर्फ इतना ही नहीं ऐसा भी देखा गया है कि स्कूल पेरेंट्स एजुकेशन के नाम पर प्वाइंट भी देते हैं. इसमें जिनके माता पिता अध‍िक पढ़े लिखे हैं, उन्हें अध‍िक प्वाइंट मिल जाते हैं. श‍िक्षा निदेशालय के नियमों के मुताबिक कोई भी स्कूल पेरेंट्स की श‍िक्षा के आधार पर दाख‍िले को वरीयता नहीं दे सकता. 


ओरल टेस्ट नहीं ले सकते स्कूल मगर भी स्कूल फिर भी माता पिता और बच्चे का मीटिंग के बहाने से इंटरव्यू कर ही लेते। 
कोई भी स्कूल दाख‍िले के लिए छात्र का किसी भी तरह का टेस्ट नहीं सकता. न ही अभ‍िभावकों का इंटरव्यू या अंग्रेजी बोलने को वरीयता दे सकता है. अगर कोई स्कूल अभ‍िभावकों पर इस तरह का दबाव डालता है तो ये सरकार के दाख‍िला नियमों के एकदम विपरीत है.

वेजिटेरियन या ज्वाइंट फैमिली के प्वाइंट नहीं दे सकते 
कई स्कूल ऐसे बच्चों का दाख‍िला लेने में रुचि दिखाते हैं जो ज्वाइंट फैमिली में रहते हों.  बीते सालों में ऐसा देखा गया है कि कई स्कूल ज्वाइंट फैमिली के प्वाइंट भी देते हैं. वहीं कई स्कूल जो माइनारिटीज कम्यूनिटी के हैं, उन्हें वहां वेजि‍टेरियन को भी प्वाइंट दिए जाने की श‍िकायतें आई हैं. स्कूल किसी भी हाल में ऐसी चीजों पर प्वाइंट नहीं दे सकते जो बच्चों में विभेद की भावना लाए.    

शिक्षा प्रणाली में सुधार _

शिक्षा में ऑनलाइन एडमिशन _
 RTE UP Admission Online आवेदन से मिलने वाले लाभ एवं विषेशताएं
RTE के माध्यम से गरीब नागरिकों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाएगी।
बच्चों के लिए 25% सीट सरकार द्वारा आरक्षित की गयी है।
ऑनलाइन माध्यम से आवेदन करने पर समय और पैसे दोनों की बचत हो सकेगी।
आवेदन करने के लिए आवेदक को कही भी इधर-उधर जाने की आवश्यकता नहीं है वह ऑनलाइन माध्यम द्वारा कही से भी आवेदन कर एडमिशन ले सकते हैं।


किसी भी स्कूल की शिकाकायत _
                                                                    
  हर जिले में शिक्षा विभाग का एक कार्यालय अवश्य होता है और वहां पर आप उस जिले के किसी भी विधालय के खिलाफ शिकायत कर सकते है इसके लिए आपको शिक्षा विभाग कार्यालय में जाना है और वहां पर आपको अपनी परेशानी को अधिकारियो के समक्ष पेश करना है इसके बाद अगर आप लिखित में कोई शिकायत करना चाहते है तो वो भी कर सकते है आप शिकायत के साथ कोई सबूत है तो उसकी प्रति भी संकलित करे ताकि अधिकारियो को आपकी परेशानी को हल करने में आसानी हो.

अगर कार्यवाही से असंतुष्ट है तो क्या करें
अगर आपको लगता है की शिक्षा विभाग की तरफ से आपकी शिकायत पर पर्याप्त कार्यवाही नहीं की जा रही तो ऐसे में प्रत्येक आम नागरिक को अपनी समस्या को जिला कलेक्टर के समक्ष रखने की शक्ति प्राप्त है आप अपनी शिकायत को जिला कलेक्टर के कार्यालय में दर्ज कर सकते है उसके बाद जिला कलेक्टर आपके द्वारा दी गयी शिकायत पर कार्यवाही करना प्रारम्भ करते है और आपकी उचित न्याय मिल जाता है. 

कक्षा 8 के बाद बिना मान्यता प्राप्त निजी स्कूल से सरकारी स्कूल में (Admission in RTE) बदलाव से बच्चों की मनःस्थिति और शिक्षा प्रभावित हो सकती है और इस प्रकार आरटीई के लाभों का विस्तार शिक्षा में निरंतरता को सुनिश्चित करेगा।

शिक्षा का अधिकार की विशेषताएँ
धारा 12 (1) (C) में कहा गया है कि गैर-अल्पसंख्यक निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल आर्थिक रूप से कमज़ोर और वंचित पृष्ठभूमि के बच्चों के लिये प्रवेश स्तर ग्रेड में कम- से-कम 25% सीटें आरक्षित करें।

यह विद्यालय न जाने वाले बच्चे के लिये एक उपयुक्त आयु से संबंधित कक्षा में भर्ती करने का प्रावधान भी करता है।

यह केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय एवं अन्य ज़िम्मेदारियों को साझा करने के बारे में भी जानकारी देता है।

भारतीय संविधान में शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है और केंद्र व राज्य दोनों इस विषय पर कानून बना सकते हैं।

यह छात्र-शिक्षक अनुपात, भवन और बुनियादी ढाँचा, स्कूल-कार्य दिवस, शिक्षकों के लिये कार्यावधि से संबंधित मानदंडों और मानकों का प्रावधान करता है।

इस अधिनियम में गैर-शैक्षणिक कार्यों जैसे-स्थानीय जनगणना, स्थानीय प्राधिकरण, राज्य विधानसभाओं और संसद के चुनावों तथा आपदा राहत के अलावा अन्य कार्यों में शिक्षकों की तैनाती का प्रावधान करता है। 


हमारी धरोहर नदियों का अस्तित्व

सामान्य लेख 

अपनी नदियों को खो देता है, वह समाज निश्चित रूप से अभिशप्त है। हमारी पीढ़ी अपनी नदियों को खो चुकी है।
ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं कि किसी शहर का नाला कभी नदी होता था।
आज की दिल्ली नजफगढ़ नाले को जानती है, जो शहर के कचरे को यमुना में
लाकर छोड़ता है। लेकिन लोगों को यह नहीं मालूम कि इस नाले का स्रोत एक
झील है, जो साहिबी नदी से जुड़ी थी। अब साहिबी भी खत्म हो गई और झील
भी। लोगों के जेहन में सिर्फ एक नाला है, जिसमें पानी नहीं, केवल प्रदूषण बहता है। इससे भी बुरी बात यह है कि दिल्ली की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द फैला नया गुड़गावं अपना मल-मूत्र इस नजफगढ़ झील में डाल रहा है।
 लुधियाना का बूढ़ा नाला भी एक गंदे नाले में तब्दील हो गया है और गधं से सड़ता हुआ। बहुत समय नहीं हुआ, जब बूढ़ा एक दरिया था, एक नदी। इसमें निर्मल जल बहता था। केवल एक पीढ़ी के काल में ही इसका हाल और नाम बदल गया है।
मिठी नदी भी मुंबई को शर्मसार कर रही है। जब वर्ष 2005 में मुंबई शहर बाढ़ से डूबा, तब पता चला कि मिठी नाम का नाला अवरुद्ध हो गया है। यह नाला आज
भी प्रदूषण और अतिक्रमण की चपेट में है। लेकिन मुंबई शहर को इस बात का आभास नहीं है कि मिठी शहर के लिए नहीं, अपितु यह शहर मिठी के लिए शर्म का कारण
है। 
मुंबई के पास से निकालने वाला यह नाला कभी वास्तव में नदी हुआ करता था, नदी की तरह बहता था और नदी के तौर पर ही जाना जाता था। लेकिन वर्तमान में आधिकारिक पर्यावरण रिपोर्ट में भी यह नदी एक बरसाती
नाले के रूप में दर्ज है।दिल्ली की तरह मुंबई ने भी एक ही पीढ़ी में अपनी नदी को खो
दिया है।





लेकिन हम हैरान क्यों हैं? हम अपनी नदियों से बहुत ही बेदर्दी से साफ पानी लेते हैं और बदले में उन्हें मल तथा औद्योगिक कचरे से
भर देते हैं। हमारी कई नदियों के ऊपरी हिस्सों में बहाव ही नहीं है, क्योंकि हमने पानी से बिजली पैदा करने के लिए इसे रोक दिया है। इंजीनियरों-डिजाइनरों के पास नदी के प्राकृतिक बहाव के बारे में ऐसी कोई समझ नहीं है कि बिजली बनाने के लिए पानी का इस्तेमाल तभी किया जाएगा जब पर्यावरणीय और सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद भी नदी में पर्पया्त पानी बचा हो। जब
गंगा , यमुना, नर्मदा या कावेरी मैदानी इलाकों में पहुंचती हैं, हम सिंचाई और पेयजल के लिए पानी की एक-एक बूंद सोख लेते हैं। 

हम नदियों को चूस कर सूखा छोड़ देते हैं। नदियों को पूजते हुए भी हम उनमें कूड़ा-करकट, प्लास्टिक और न जाने क्या-क्या डाल देते हैं। हम यह सब करते हैं और फिर भी विश्वास है कि नदियां पूजा के लायक हैं। या इसका अर्थ यह है कि हम एक मरी हुई या मरणासन्न नदी की पूजा करते हैं, उनकी दुर्दशा को नजरंदाज करते हुए।

आज हमारी नदियां मर रही हैं- इनके कई हिस्सों में पानी में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा शून्य है। इस कारण इनमें जीवन नहीं है। इनमें सिर्फ हमारा मल बहता है, ये हमारे मल-मूत्र को बहाने वाली नहरें हैं।
हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम ऐसा नहीं होने देंगे। इसके लिए हमें पानी के इस्तेमाल और कचरे के निस्तारण के बीच के संबंध को जानना होगा, हमारे नल, फ्लश और नदी के बीच संबंध को पहचानना होगा। आज हमें अपने घरों में पानी मिल रहा है, हम कचरा पैदा कर रहे हैं और नदियों को मरता हुआ
देख रहे हैं। ऐसा लगता है कि हम कुछ जानना ही नहीं चाहते। क्या भारतीय समाज की जाति व्यवस्था के कारण ऐसा हो रहा है, जिसमें सफाई करना किसी और की
जिम्मेदारी है? या फिर हमारी मौजूदा
प्रशासनिक व्यवस्था के चलते ऐसा है, जहां पानी और कचरा प्रबंधन सरकार का काम है और उसमेंभी निचले दर्जे के कर्मचारियों का? या फिर यह भारतीय समाज की उस मानसिकता के कारण है कि अमीर होकर व्यक्ति सब कुछ ठीक कर सकता है, कि पानी की कमी और कचरा तत्कालिक समस्याएं हैं, एक बार हम अमीर हुए नहीं कि हम आधारभूत ढांचे का विकास कर लेंगे और फिर पानी
अपने आप बहने लगगा े तथा सड़ने वाला मल अपने आप गायब हो जाएगा?इस दौर में समाधान भी मौजूद हैं। पहला, हमें पानी
के उपयोग को संयमित करना होगा, ताकि
दषिूत जल कम निकले। हमें पानी की बर्बादी को रोकना ही होगा। दूसरा, हमें बारिश के पानी को सहेजना सीखना होगा-घरों और संस्थानों में बरसात के पानी का संग्रहण करना होगा, ताकि भूजल को रीचार्जकिया जा सके। हमें यह मागं भी जोर-शोर से उठानी होगी कि झील या तालाब को कचरे से न
भर दिया जाए या नदी की पहचान समाप्त न कर दिया जाए। तीसरा, हमें शहरों में कचरा
प्रबंधन की जरूरत को समझना होगा
तथा इस बात की निगरानी करनी होगी कि सीवेज और कचरा कहां निस्तारित हो रहा है। जब हम यह समझ लेंगे, तब हम यह मागं कर सकेंगे कि कचरे का पुनर्चक्रण हो तथा गंदे
 पानी को साफ कर दोबारा इस्तेमाल किया जाए।
समय आ गया है जब हमें अपनी नदियों के खोने पर आक्रोशित होना चाहिए। वरना हमारी पीढ़ी को न सिर्फ नदियों के खोने का अफसोस रहेगा बल्कि नदियों के सामूहिक संहार का अपराधी भी माना जाएगा। हमारे बच्चे यह नहीं जान पाएंगे कि नर्मदा, यमुना, कावेरी या कृष्णा गोदावरी नदियां थीं। वे उन्हें
सिर्फ गंदे नालों के रूप में ही देखेगे ।इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हमारी धरोहर नदियों को नवजीवन दे।

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चीनी फ्री प्रोडक्ट सेहत के लिए कितने अच्छे हैं?

 शुगर फ्री कितना अच्छा है, कितना नुकसान पहुंचा सकता हैं।😐

SUGAR FREE के नाम पर धोखा!:100 ग्राम मिठाई में 0.5 ग्राम से कम चीनी ही SUGAR FREE , जानिए...कंपनियों के झूठ कितना परोसती हैं।




शुगर मरीजों की डाइट चार्ट 


देश में रक्षा बंधन के साथ त्योहारी सीजन शुरू हो गया है। हर साल रक्षा बंधन से लेकर नए साल तक पूरा देश अलग-अलग त्योहारों के साथ जश्न मनाता है और इसका सबसे जरूरी हिस्सा होता है…मुंह मीठा कराना। लेकिन पोस्ट कोविड दौर में जब लोगों को सेहत की चिंता पहले से ज्यादा है तो मीठे पर कंट्रोल करना भी जरूरी हो गया है। सेहत की यही चिंता LOW SUGAR और SUGAR FREE मिठाइयों का बड़ा बाजार तैयार करती है।


शुगर कितनी लेनी चाहिए?

भारत में फूड प्रोडक्ट्स का बाजार करीब 60 हजार करोड़ का है और इसमें शुगर-फ्री प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी 500 करोड़ से ज्यादा की है। यह हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। SUGAR FREE के साथ ही LOW SUGAR या NO ADDED SUGAR ऐसे लेबल हैं जो सेहत की फिक्र करने वाले मिष्ठान प्रेमियों के बीच खासे लोकप्रिय है

 अगर आप सिर्फ यह लेबल्स देखकर यह मान लेते हैं कि यह मिठाइयां या प्रोडक्ट्स आपका कैलोरी लेवल नहीं बढ़ाएंगी या शुगर को नियंत्रित रखेंगी तो संभल जाइए। पैकेज्ड उत्पादों के सिर्फ लेबल ही नहीं उन पर दिए गए NUTRITIONAL INFORMATION को भी ध्यान से देखिए।


अमेरिका के पर्ड्यू यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के मुताबिक, डाइट सोडा से मोटापा, डायबिटीज और हार्ट संबंधित बीमारियां हो सकती हैं. जो लोग वजन कम करने के लिए डाइट सोडा और ड्रिंक्स का सेवन करते हैं, उन चीनी मुक्त ड्रिंक में चीनी दूसरे फॉर्म में रहती है और वह पतला करने के बजाय वजन बढ़ा सकती है और उनके कई नुकसान भी हो सकती हैं.10 मार्च 2022भरतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI कहता है कि LOW SUGAR का क्लेम वही प्रोडक्ट कर सकते हैं जिनमें प्रति 100 ग्राम वजन में शुगर की मात्रा 5 ग्राम से कम हो। SUGAR FREE होने के लिए प्रति 100 ग्राम वजन में शुगर की मात्रा 0.5 ग्राम से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। जानिए, कैसे कंपनियां इन नियमों का उल्लंघन करती हैं और इन मानकों के पालन के लिए शुगर के जो विकल्प इस्तेमाल होते हैं वो सेहत पर क्या असर डालते हैं।😊